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छंद किसे कहते हैं, अंग, भेद, प्रकार और इसके उदाहरण | Chhand in Hindi

इस आर्टिकल में हम छंद किसे कहते हैं, अंग, भेद, प्रकार और इसके उदाहरण आदि के बारे में पढेंगे, तो चलिए विस्तार से पढ़ते हैं छंद के बारे में (Chhand in Hindi). बहुत ही सरल भाषा में लिखा गया है जो परीक्षा की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी है।

छंद किसे कहते हैं, अंग, भेद, प्रकार और इसके उदाहरण | Chhand in Hindi

छंद किसे कहते हैं, अंग, भेद, प्रकार और इसके उदाहरण | Chhand in Hindi
Chhand in Hindi

छंद का शाब्दिक अर्थ

छंद शब्द ‘छन्द्‘ धातु से बना है जिसका अर्थ है ‘आहादित (प्रसन्न) करना‘ अथवा ‘खुश करना‘|

छंद किसे कहते हैं ?

छंद की परिभाषा: वर्णों या मात्राओं के नियमित संख्या के विन्यास से यदि आहाद अर्थात् (खुशी) उत्पन्न हो, तो उसे छंद कहते है ।

कुछ प्रसिद्ध साहित्यकारों के अनुसार छन्द की परिभाषा

(1). डॉ० जगदीश गुप्त – (हिन्दी साहित्य कोश) के अनुसार:अक्षर‘ अक्षरों की संख्या एवं क्रम, मात्रा / गणना तथा यति, गति आदि से सम्बन्धित विशिष्ट नियमों से नियोजित पद्य रचना ‘छन्द‘ कहलाती है।

(2). आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार: “छोटी – छोटी” सार्थक ध्वनियों के प्रवाहपूर्ण सांमजस्य का नाम छन्द है।

(3). अज्ञेय के अनुसार: “छन्द का अर्थ केवल तुक या बँधी हुई समान स्वर मात्रा या वर्ण संख्या नहीं है छन्द योजना का नाम है जहाँ भाषा की गति नियन्त्रित है वहाँ ‘छन्द‘ है।

छंद का अन्य नाम

छन्द का दूसरा नाम ‘पिंगल‘ भी है। क्योंकि इसके आदि प्रणेता ‘पिंगले ऋषि‘ माने जाते है तथा ‘छन्दशास्त्र‘ को “पिंगल शास्त्र” कहते है।

नोट (Note):-
1. छन्द शब्द का प्रथम उल्लेख, ऋग्वेद में मिलता है।
2. जिस प्रकार गद्य का नियामक व्याकरण है, उसी प्रकार पद्य का 'छन्द शास्त्र' है।

छन्द के अंग

छन्द के अंग निम्नलिखित इस प्रकार है:

  1. चरण / पद / पाद
  2. वर्ण और मात्रा
  3. संख्या और क्रम
  4. गण
  5. गति
  6. यति / विराम
  7. तुक

1. चरण / पद / पाद

छन्द में प्राय: चार चरण होते है पहले और तीसरे चरण को विषम चरण तथा दूसरे और चौथे चरण को सम चरण कहा जाता है। किसी- किसी छन्दों जैसे-छप्पय , कुण्डलिया आदि में छह चरण होते है।

2. वर्ण और मात्रा

वर्ण दो प्रकार के होते है हस्व /लघु (अ, इ, उ, ऋ) दीर्घ/गुरू ( आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ) हस्व वर्ण की एक मात्रा और दीर्घ वर्ण की दो मात्रा गिनी जाती है।

Note:- मात्रा केवल स्वरों की होती है
लघुमात्रा (l)
दीर्घमात्रा (S)

3. संख्या या क्रम

वर्णों और मात्राओं की गणना को संख्या कहते हैं तथा लघु-गुरु के स्थान निर्धारण को क्रम कहते हैं।

4. गण

तीन वर्णो के लघु गुरू क्रम के अनुसार योग को गण कहते है। तथा वार्षिक छन्दों में गणों की गणना की जाती है।

गणों की संख्या आठ है। यगण, मगण, तगण, रगण, जगण, भगण, नगण, सगण है तथा इन गणों को समझने के लिए निम्न सूत्र उपयोगी है- यमाताराजभानसलगा

गण की संख्यागण का नामसंकेतसूत्रगत उदाहरणसार्थक उदाहरण
1.यगणl S Sयमातायशोदा
2.मगणS S Sमातारामायावी
3.तगणS S lताराजतालाब
4.रगणS l Sराजभारामजी
5.जगणS l Sजभानजलेश
6.भगणS l lभानसभारत
7.नगणl l lनसलनगर
8.सगणl l Sसलगासरिता

5. गति

पढ़ते समय कविता के स्पष्ट सुखद प्रवाह को गति कहते है।

6. यति/विराम

छन्दों में विराम या रुकने के स्थलों को ‘यति‘ कहते है।

7. तुक

चरण के अन्त में आने वाले समान वर्षो को तुक कहते हैं।

जिस छंद के अंत मे तुक हो उसे तुकान्त छंद और जिस जिसके अन्त मे तुक न हो उसे अतुकान्त छंद कहते है।

लघु और गुरु के नियम

1. लघु- अ, इ, उ-इन ह्रस्व स्वरों तथा इनसे युक्त एक व्यंजन या संयुक्त व्यंजन को ‘लघु‘ समझा जाता है। जैसे- कलाम; इसमें तीनों वर्मा लघु है। इस शब्द का मात्राचिह्न हुआ –।।। |
2. चंद्रबिंदु वाले ह्रस्व स्वर भी लघु होते हैं। जैसे – ‘हँ‘।
1. गुरु- आ, ई, ऊ और इत्यादि दीर्घ स्वर और इनसे युक्त व्यंजन गुरु होते हैं। जैसे- राजा, दीदी, दादी इत्यादि। इन तीनों शब्दों का मात्राचिह्न हुआ- SS |
2. ए, ऐ, ओ, औ– ये संयुक्त स्वर और इनसे मिले व्यंजन भी गुरु होते हैं। जैसे- ऐसा, ओला, औरत, नौका इत्यादि।
3. अनुस्वारयुक्त वर्ण गुरु होता हैं। जैसे- संसार। लेकिन, चंद्रबिंदु वाले वर्ण गुरु नहीं होते
4. विसर्गयुक्त वर्ण भी गुरु होता है। जैसे- स्वत:, दुःख, अर्थात – lS S l l
5. संयुक्त वर्ण के पूर्ण का लघु वर्ण गुरु होता है। जैसे- सत्य, भक्त, दुष्ट, धर्म इत्यादि, अर्थात्- S l l

छंद के भेद अथवा प्रकार

मान्यता के आधार पर छंद के तीन प्रकार है जबकि मुख्यतः छन्द के दो प्रकार है।

  1. वर्णिक छंद (या वृत्त)
  2. मात्रिक छंद (या जाति)
  3. मुक्त छंद

1. वर्णिक छंद (या वृत्त)

जिस छन्द के सभी चरणों में वर्णों की संख्या समान हो उसे ‘वर्णिक छन्द‘ कहते है।

2. मात्रिक छंद (या जाति)

जिस छंद के सभी चरणों में मात्राओं की संख्या सामान हो उसे ‘मात्रिक छंद‘ कहते है।

3. मुक्त छंद

जिस छन्द में वर्णिक /मात्रिक, जैसा प्रतिबन्ध या नियम न हो उसे ‘मुक्त छंद‘ कहते है।

छंद के भेद

  • छंद के भेद
    • वर्णिक छंद
      • सम
        • साधारण (26 वर्ण तक)
        • दंडक (26 वर्ण से अधिक)
      • अर्द्धसम
      • विषम
    • मात्रिक छंद
      • सम
        • साधारण (32 मात्रा तक)
        • दंडक (32 मात्रा से अधिक)
      • अर्द्धसम
      • विषम
    • मुक्त छंद
Note:- (सम, अर्द्धसम और विषम)

(i) सम: जिन छन्दों के चारों चरणों की मात्राएँ या वर्ण एक से हो वे 'सम' कहते है। जैसे - चौपाई, इन्द्रवज्रा आदि।
(ii) अर्द्धसम: जिसमें पहले और तीसरे तथा दूसरे और चौथे चरणों की मात्राओं और वर्णो मे समता हो वे 'अर्द्धसम' कहलाते है। जैसे- दोहा, सोरठा आदि।
(iii) विषम: छन्दों में चार से अधिक (छह ) चरण हो, और वे एक से न हो, वे 'विषम' कहलाते है।, जैसे- छप्परा और कुण्डलिया आदि ।

मात्रिक छंद | Matrik Chhand in Hindi

मात्रिक छंद की परिभाषा: मात्रिक छंदों में केवल मात्राओं की व्यवस्था होती है, वर्णों के लघु और गुरु के क्रम का विशेष ध्यान नही रखा जाता। इन छंदों के प्रत्येक चरण में मात्रों की संख्या निश्चित रहती है। मात्रिक चाँद तीन प्रकार के होता है – सम, अर्ध्दसम और विषम

  • सम मात्रिक छंद: अहीर, तोमर, चौपाई अरिल्ह, रोला दिक्पाल रूपमाला, गीतिका, सरसी, सार, हरिगीतिका, ताटंक, वीर/आल्हा
  • अर्द्धसम मात्रिक छंद: दोहा, सोरठा आदि।
  • विषम मात्रिक छंद: छप्परा और कुण्डलिया आदि

सम मात्रिक छंद – Sam Matrik Chhand in Hindi

1. चौपाई सममात्रिक छन्द

यह मात्रिक सम छन्द है। इसमें चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। पहले चरण की तुक दूसरे चरण से तथा तीसरे चरण की तुक चौथे चरण से मिलती है। प्रत्येक चरण के अन्त में यति होती है। चरण के अन्त में जगण (ISI) एवं तगण (SSI) नहीं होने चाहिए। उदाहरण निम्नवत् है :

उदाहरण-

। । । । ऽ । ऽ । । । ऽ । ।
जय हनुमान ग्यान गुन सागर।
। । । ऽ । । । ऽ । । ऽ । ।
जय कपीस तिहुँ लोग उजागर।
ऽ । ऽ । । । । । । । ऽ ऽ
राम दूत अतुलित बलधामा।
ऽ। । ऽ। । । । । । ऽ ऽ
अंजनी पुत्र पवन सुत नामा।

2. गीतिका-सममात्रिक छन्द

प्रत्येक चरण में 26 मात्राएँ होती हैं, 14 और 12 पर यति। चरणान्त में लघु-गुरु विन्यास आवश्यक होता है।

उदाहरण-

ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ । । ऽ । ऽ
साधु भक्तों में सुयोगी, संयमी बढ़ने लगे।
ऽ । ऽ ऽ । ऽ । । ऽ । ऽ । । ऽ । ऽ
सभ्यता की सीढ़ियों पर सूरमा चढ़ने लगे।।

3. हरिगीतिका सममात्रिक छन्द

यह मात्रिक सम छन्द हैं। प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ होती हैं। यति 16 और 12 पर होती है तथा अन्त में लघु और गुरु का प्रयोग होता है।

उदाहरण-

कहते हुए यों उत्तरा के नेत्र जल से भर गए।
हिम के कणों से पूर्ण मानो हो गए पंकज नए॥
। । ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ । । । ऽ

4. रौला-सममात्रिक छन्द

मात्रिक सम छन्द है, जिसके प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं तथा 11 और 13 पर यति होती है। प्रत्येक चरण के अन्त में दो गुरु या दो लघु वर्ण होते हैं। दो-दो चरणों में तुक आवश्यक है।

उदाहरण-

। । । । ऽ ऽ । । । ऽ । ऽ ऽ । । । । ऽ
नित नव लीला ललित ठानि गोलोक अजिर में।
रमत राधिका संग रास रस रंग रुचिर में।।

अर्द्धसम मात्रिक छंद – Ardhsam Matrik Chhand in Hindi

1. दोहा

यह मात्रिक अर्द्धसम छन्द है। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में 13 मात्राएँ और द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 11 मात्राएँ होती हैं, यति चरण के अन्त में होती है। विषम चरणों के अन्त में जगण (ISI) नहीं होना चाहिए तथा सम चरणों के अन्त में लघु होना चाहिए। सम चरणों में तुक भी होनी चाहिए।

उदाहरण-

ऽ । । । । । । ऽ । । । । । । । । । । । ऽ ।
श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मन मुकर सुधारि।
बरनऊ रघुवर विमल जस, जो दायक फल चारि।
। । । । । । । । । । । । । ऽ ऽ । । । । ऽ ।

2. सोरठा

मात्रिक अर्द्धसम छन्द है। इसके विषम चरणों में 11 मात्राएँ एवं सम चरणों में 13 मात्राएँ होती हैं। तुक प्रथम एवं तृतीय चरण में होती है। इस प्रकार यह दोहे का उलटा छन्द है।

उदाहरण-

ऽ । ऽ । । । ऽ । । ऽ । । । । । ऽ । । ।
कुंद इंदु सम देह, उमा रमन करुना अयन।
जाहि दीन पर नेह, करहु कृपा मर्दन मयन॥
ऽ । ऽ । । । ऽ । । । । । ऽ ऽ । । । । ।

3. बरवै

यह मात्रिक अर्द्धसम छन्द है जिसके विषम चरणों में 12 और सम चरणों में 7 मात्राएँ होती हैं। यति प्रत्येक चरण के अन्त में होती है। सम चरणों के अन्त में जगण या तगण होने से बरवै की मिठास बढ़ जाती है।

उदाहरण-

ऽ । ऽ । । । ऽ । । । ऽ । ऽ ।
वाम अंग सिव सोभित, सिवा उदार ।
सरद सुवारिद में जनु, तड़ित बिहार।।
। । । । ऽ । । ऽ । । । । । । ऽ ।

विषम मात्रिक छंद – Visham Matrik Chhand in Hindi

1. कुण्डलिया

मात्रिक विषम संयुक्त छन्द है जिसमें छह चरण होते हैं। इसमें ।। एक दोहा एक रोला होता है। दोहे का चौथा चरण रोला के प्रथम चरण में दुहराया जाता है तथा दोहे का प्रथम शब्द ही रोला के अन्त में आता है। इस प्रकार कुण्डलिया का प्रारम्भ जिस शब्द से होता है, उसी से इसका अन्त भी होता है। प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ होती हैं परन्तु मात्राओं का क्रम पहले दो चरणों में 13, 11 का तथा बाद में चार चरण में 11, 13 का रहता है।

उदाहरण-

ऽ ऽ । । ऽ ऽ । ऽ । । । । ऽ ऽ ऽ । = 24 मात्राएँ
सांई अपने भ्रात को, कबहुं न दीजै त्रास।
पलक दूरि नहिं कीजिए, सदा राखिए पास।
सदा राखिए पास, त्रास, कबहुं नहिं दीजै।
त्रास दियौ लंकेश ताहि की गति सुनि लीजै।
कह गिरिधर कविराय राम सौं मिलिगौ जाई।
पाय विभीषण राज लंकपति बाज्यौ सांई।

2. छप्पय

यह मात्रिक विषम छन्द है। इसमें छह चरण होते हैं- प्रथम चार चरण रोला में 24-24 मात्राएँ और अन्तिम दो चरणों में उल्लाला के 28-28 मात्राएँ होती हैं। छप्पय में उल्लाला के सम-विषम चरणों का यह योग 15 + 13 = 28 मात्राओं वाला ही अधिक प्रचलित है।

उदाहरण-

। ऽ । ऽ । । ऽ । । । । ऽ । । ऽ । । ऽ = 24 मात्राएँ
जहाँ स्वतंत्र विचार न बदलें मन में मुख में।
जहाँ न बाधक बनें, सबल निबलो के सुख में।
सब को जहाँ समान निजोन्नति का अवसर हो।
शांतिदायिनी निशा हर्षसूचक वासर हो।।

। । ऽ । । ऽ । । ऽ । ऽ । । ऽ ऽ । । । । । । । = 28 मात्राए
सब भाँति सुशासित हों जहाँ, समता के सुखकर नियम। = 28 मात्राए
बस उसी स्वशासित देश में, जागें हे जगदीश हम। = 28 मात्राए

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